उत्तराखंड की बाढ़ में बहकर आए 7 बडे़ सवाल

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कब तक जारी रहेगी यह तबाही?

उत्तराखंड में हर बरसात विनाश की ऐसी कहानी लिख जाती है। मालपा, बूढ़ाकेदार, उत्तरकाशी में प्रकृति के विनाश को देखकर-झेलकर भी हमने सबक नहीं लिया। ठीक है कि आपदाएं और कुदरत का कहर बताकर नहीं आता। लेकिन बचाव का को‌ई सिस्टम भी हो, जो इन आपदाओं में जिंदगियां बचाने में कुछ मदद दे।

मौसम के लिए आधुनिक रडार प्रणाली की बात तो दूर, यहां मामूली संवाद तंत्र भी नहीं हैं। हर बार की आपदा को आखिरी आपदा मानकर भुला दिया गया। यही कारण है कि जब इस बार महाविनाश हुआ तो असहाय लोग खड़े देखते रहे। आपदा से निपटने के लिए हमारे पास कोई खास सिस्टम नहीं रहा।

यही कारण है कि मुसीबत में पड़े लोगों को दो-तीन दिन तक यह भी पता नहीं था कि अपनी बात कहें तो किसे? ऐसे राज्य में थोड़े-थोड़े फासले पर प्रशासनिक स्तर पर ऐसे सिस्टम खड़े होने चाहिए थे, जो ऐसी घटनाओं पर तत्काल कदम उठाते या व्यवस्था को चौकस करते। यह बाढ़ तबाही के साथ कुछ सवाल भी बहा लाई है, जिसके जवाब तलाशने आसान नहीं।

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