पक्षी

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जब चाहे खुले आसमां की ऊंचाइयों में उड़े
जब चाहे धरती के इस छोर पर बैठे
जब चाहे धरती के उस छोर पर बैठे

पक्षी
जब चाहे हरे–भरे पेड़ों की छांव में बैठे
जब चाहे सूखे–नंगे पेड़ की वीरानगी सुने

पक्षी
कभी इस देश से उड़कर परदेश पहुंच जाए
कभी झुंड में उड़कर एकता का पैगाम पहुंचाए

पक्षी
भोर होते ही मधुर संगीत सुनाए
शाम होते ही अपने घोसलों में बैठ जाए

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