पलायन से उजड़ते गांव इधर भी, उधर भी

0
378

 

 

vymesh jugran

 

 

 

 

 

व्योमेश चन्द्र जुगरान 

 

 

यह किस्सा स्पेन के टरयुल प्रांत के  एक गांव का है जो कुछ अरसा ‘गार्जियन’ के हवाले से एक अखबार में छपा था। कभी समृद्धि की ऊंचाई छूने वाले इस गांव में नई पीढ़ी के पलायन के कारण आबादी का छठा हिस्सा यानी सिर्फ दाने-सयाणे बचे हैं। वे अपने पुरखों की भूमि पर देह त्यागने की तमन्ना में जी रहे हैं। गांव ने सालों से किसी बच्चे की

किलकारी नहीं सुनी। स्कूल कभी का बंद हो चुका है। बावजूद इसके गांव का वैभव लौटाने की खातिर इन बचे-खुचे वाशिंदों ने एक अंतिम कोशिश की और विज्ञापन दिए कि लोग यहां आकर बसें। इसके लिए बाल-बच्चेदार लोगों को मुफ्त घर व जमीन, टैक्स में छूट और बच्चों की देखभाल के विशेष इंतजाम जैसी लुभावनी पेशकशें की गईं। इसी प्रलोभन में कुछ आवेदकों ने गांव का भ्रमण किया। बाहर से लोग जब गांव पहुंचे तो यहां रह रहे बुजुर्गों ने पिछले एक दशक में पहली बार गांव के खेतों और घरों में बच्चों को कूदते-फांदते देखा और उनकी किलकारियां सुनीं। बूढ़ी आंखें यही तो चाहती थीं कि गांव की अगली पीढ़ी के पर्याय ये नन्हें-मुन्ने यहां आएं और गांव आबाद रहे।

 


 

dhoor_vyomeshएक समृद्ध यूरोपीय देश से जुड़ी होने के कारण घटना चैंकाती जरूर है लेकिन इसके अक्स पलायन की त्रासदी भोगते उत्तराखंड के सैकड़ों गांवों के उजाड़ घरों और बंजर खेतों में भी देखे जा सकते है।
पौड़ी के कल्जीखाल ब्लाक में चीड़ के जंगलों की खूबसूरत ढलान पर एक छोटा सा गांव है-धूर। गांव की सरहद में दाखिल होते ही एक घर की टिन चमकने लगती है। नजदीक जाने पर ब्रिटिशकालीन शिल्प के एक ढांचे से सामना होता है। कटवा पत्थरों का यह ढांचा कभी इसी गांव के वाशिंदे डिप्टी साहब का बंगला था। इसके वारिस आज अमेरिका और इंग्लैंड में रहते हैं। बंगले तक पहुंचने का रास्ता कंटीली झाड़ियों की खोह में गुम हो चुका है।
गांव से थोड़ा और नीचे बढ़ते हुए पठळयूं की छतों वाले छोटे-छोटे घरों की दीवारों और आंगन में खर-पतवार ने स्थायी डेरा जमा लिया है। इन घरों के वारिस भी देहरादून, दिल्ली इत्यादि शहरों में बस चुके हैं। सबसे नीचे लैंटर की छत का एक आधुनिक मकान है। यह मध्यप्रदेश के एक रिटायर्ड डीजी साब का है जिन्होंने अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति की खातिर अपने पुश्तैनी मकान का जीर्णोद्धार किया। वैसे डीजी साब अपने जीवन काल में महज एक या दो बार ही यहां पधारे हैं वरना उनकी स्थायी रिहायश अब भोपाल ही है। गांव में रह रहे एकमात्र परिवार की नई पीढ़ी भी बाहर पलायन कर चुकी है और यहां बचे दो-एक सदस्यों के बारे में कहना मुश्किल है कि वे इस एकाकीपन का त्रास कब तक झेल सकेंगे। बताते हैं कि इस गांव के पुरखों की जमीन आसपास के सात गांवों तक फैली हुई थी। गांव के जो वारिस जिंदा हैं, उनमें से किसी को न तो अपनी जमीनों का पता है और न ही शायद वास्ता।
पौड़ी गढ़वाल की बणेलस्यूं पटटी के घीड़ी गांव में ऐसे ही झाड़-झंखाड़ से घिरे टूटे खंडहरों में से एक का संबंध देश की चर्चित हस्ती अजित डोभाल से भी है। आईबी के पूर्व प्रमुख श्री  डोभाल वर्तमान में एनएसए है। पिछले साल जून माह डोभाल साब सपरिवार घीड़ी पधारे। यहां वे अपनी कुलदेवी की पूजा में शरीक होने आए थे। सौभाग्य से घीड़ी से अपना भी नाता है और यह अपनी ननिहाल है। पौड़ी में उस रोज सुबह अखबार देखे तो खबरों में घीड़ी गांव छाया हुआ था। हमने भी मौका ताड़ा और पहुंच गए ननिहाल, यह देखने कि जो व्यक्ति खुफिया ब्यूरो का प्रमुख रहते हुए न जाने कैसे-कैसे खतरों से खेला हो और जिसने न जाने कितने स्वदेशी-विदेशी आॅपरेशनों की कमान संभाली हो, वह अपने छोटे से पहाड़ी गांव में कुलदेवी के आराधक के रूप में कितना नतमस्तक दिखेगा? लेकिन व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए गांव की माटी का प्रेम उसे हमेशा छोटा बनाए रखता है।
जब हम ननिहाल पहुंचे तो मंदिर परिसर में पूजा की तैयारियां पहले से हो चुकी थीं। गांव वासी वहां एकत्र थे। इनमें वे प्रवासी परिवार भी शामिल थे जो पूजा के लिए खास तौर पर दिल्ली, देहरादून, लखनऊ इत्यादि से अपने गांव आए हुए थे। सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी बता रही थी कि डोभाल साब मंदिर के अंदर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। हालांकि सुरक्षा का वैसा तामझाम नहीं था। पारम्परिक कुर्ता-पाजामा के ऊपर काली बास्टक और सिर पर काली टोपी लगाए अजित डोभाल अपनी पत्नी, बेटा, बहू और पोते के साथ देवी पूजन संबंधी अनुष्ठान में लीन थे। मन यह देखकर गदगद था कि हम पर्वतीयों की धार्मिक थाती में कितना बल और सम्मोहन है कि अपने ग्राम्य देवी-देवताओं के आवाहन के लिए हम दूर-दूर से सरपट खिंचे चले आते हैं।
करीब दो घंटे तक डोभाल परिवार ने अपनी कुल देवी की पूजा की और आशीर्वाद प्राप्त किया। एक खास बात जो हमने देखी कि देवी की पूजा करते हुए वह अपने भक्तिभाव को नहीं रोक सके। उनका हृदय द्रवित था। छलकती नम आंखांे से इसकी साफ झलक मिल रही थी। पूजा संपन्न होने के बाद उन्होंने मुलाकात कर एक-एक गांव वाले का हालचाल जाना। गांव और गांववालों के प्रति उनका स्नेह वाकई देखने लायक था। करीब तीन घंटे उन्होंने गांव में बिताए और फिर हरिद्वार के लिए रवाना हो गए।
हमें अपनी ननिहाल में जो दूसरी बड़ी उत्सुकता थी, अपने नाना-नानी का वह मकान जिसमें हमारी मां ने अपना बचपन गुजारा था। मां से इस घर और गांव के दर्जनों किस्से सुन रखे थे। 16 कमरों का मकान और चार-चार लोगों से भी न हिलाए जा सकने वाली आंगन की वह विशालकाय पठाल। लेकिन वहां अब न वो कमरे थे और न वो पठाल। सिर्फ एक खंडहर बचा था जिसे जंगली घास-फूस और कंटीली झाड़ियों ने अपने आगोश में लपेट रखा था। हम इन झाड़ियों के बीच में दिख रही कुछ बेडौल सी दीवारों को देर तक ताकते रहे। आंखें भीग आई। घीड़ी से वापस लौटते हुए अनेक विचार मन-मस्तिष्क को मथ रहे थे। एक विचार यह भी उभरा कि पहाड़ी गांवों के लिए पलायन यदि एक पीड़ा है तो अवसर भी है। अजीत डोभाल की तरह हमारे पहाड़ों की अनेक हस्तियां पलायन के इन्हीं अवसरों की देन हैं। उनके पुश्तैनी मकान बेशक खंडहर हो गए हों लेकिन देवी-देवताओं के वंदन के रूप में पीढ़ियों को गांव से जोड़ती परंपराएं कभी खंडहर नहीं हो सकती।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here