Thursday, January 17, 2019

पक्षी

जब चाहे खुले आसमां की ऊंचाइयों में उड़े जब चाहे धरती के इस छोर पर बैठे जब चाहे धरती के उस छोर पर बैठे पक्षी जब चाहे हरे–भरे...

बचपन

कितना सुंदर, कितना प्यारा कितना निश्चल, कितना निर्मल होता है बचपन। न कोई लालच, न कोई चिंता उठकर गिरना, गिरकर उठना उमंगों से भरा होता है बचपन। दुनियादारी से दूर नई–नई...

‘‘मेरा टिहरी’’

मेरा टिहरी जो थी कभी राजाओं की राजधानी स्वामी रामतीर्थ ने की थी जहां तपस्या श्रीदेव सुमन की बलिदान की नगरी भगीरथी-मंदाकनी की संगम की नगरी हमारे पूर्वजों की...

अपना देश अपना गांव

बहुत दिनों बाद एहसास हुआ चेहरे पर खुशियों का मन में नई–नई उमंग का बहुत दिनों बाद एहसास हुआ गांव की सोंधी–सोंधी ठंडी हवा का अमृत जैसे साफ़ स्वच्छ...

बाल कविता : घर का मतलब‌

धरती सुबह-सुबह छप्पर से, लगी जोर से लड़ने। उसकी ऊंचाई से चिढ़कर, उस पर लगी अकड़ने। बोली बिना हमारे तेरा, बनना नहीं सरल है। मेरे ऊपर बनते...

कई कलाओं में माहिर थे रवींद्रनाथ टैगोर

साहित्य, संगीत, रंगमंच और चित्रकला सहित विभिन्न कलाओं में महारत रखने वाले गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर मूलतः प्रकृति प्रेमी थे और वह देश विदेश चाहे...

‘अमरूद का घर’

मधुसूदन थपलियाल कमरे में यादें रहती हैं लोगों की उनके चले जाने के बाद आ जाते हैं नये प्रवासी बिल्कुल अनभिज्ञ कोनों में छपी स्मृतियों से टांड पर पड़ी,...

चांद का मूल्य

मुकेश नौटियाल बात पुरानी है----- बहुत पुरानी, मैंने दादी से सुनी थी औद दादी ने अपनी दादी से, एक नगर था मूर्खो का नगर बेशक मूर्खों...