मां ने बेटा खोया, बहन ने भाई की कलाई, सीएम साहब 370

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स्कूल वैन इसलिए गिरी की बाप बेटे को वाहन चलाना सीख रहा था। पांच अगस्त केा कंगसाली गांव के 10 की जगह 20 बच्चे मुर्गियों की तर्ज पर वाहन में भर दिए गए और फिर एक झटके में वाहन खाई में फेंक दिया। पूरे इलाके में मातम पसरा है। जो बच्चे इस दुनिया से रूखस्त हो गए उनके मां-बाप बिलख रहे हैं। गांव में महिलाओं का क्रंदन, चीख और सांसे अटका देने वाली रोने की आवाजें पूरे वातावरण में फैली हुई है। षेाक का संमदर में पूरा गांव डूब गया है। ठीक राखी से पहले मां की गोद सूनी हो गई और बहन से भाई की कलाई छीन गई। कुछ बच्चे एम्स में भर्ती हैं। एम्स में इलाज तो चल रहा है मगर दवाईयां बाहर से मंगाई जा रही है। गरीब परिवार किसी तरह अपने बच्चे की जिंदगी के लिए दवाईयों की व्यवस्था कर रहे हैं। पूरा घटना क्रम दिल दहलाने वाला है। दुख और संवेदनाएं हर किसी के ह्दय को पिघला रहा है। इस घटना के पहलुओं पर नजर दौडाए तो आरटीओ और पुलिस सबसे पहले धटना के लिए जिम्मेदार है। कडाई से वाहन चेकिंग चल रही है मगर इस वाहन की चेकिंग क्यों नहीं हुई। थाने के पूरे स्टाफ पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। एआरटीओ ने भी जिम्मेदारी नहीं निभाई। अब बात करें षिक्षा विभाग की तो इस विभाग के अफसरों के पास समय ही नहीं है कि वे स्कूलों में जाकर निरीक्षण कर सकें कि फर्जी तरीके से कितनी स्कूलें चल रही हैं। इन्हें नेताओं की चमचागिरी करने से फुर्सत हो तो फिर कुछ करें। या तो आफिस में कुर्सी पर जमें हैं या फिर देहरादून सचिवालय या नेताओं के आगे पीछे घूम रहे हैं। उत्तराखंड में संचालित हो रही प्राइवेट स्कूलों केा देखा जाए तो 50 प्रतिषत से अधिक फर्जी तरीके से चल रहे हैं और जो षेश 50 प्रतिषत हैं उनमें से 48 फीसदी मानक ही पूरे नहीं करते। बडा बबाल होगा इसलिए षिक्षा मंत्री, मुख्यमंत्री और सरकार के अलंबरदार यानि सचिव भी मुंह सिए हुए हैं।
खैर घटना पर वापस जाते हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इतना तक जायजा नहीं समझा कि एक बार गांव जानकर परिजनों को सांत्वना दे आए। चलो साब बिजी है, उत्तराख्ंाड में 370 हटाने का जष्न मनाना है। ढोल बजाना है। पार्टी का काम करें या फिर जिनके वोटों पर सरकार बनी उनका दुख समझे। पार्टी गुस्सा हुई तो मुख्यमंत्री पद से हटा देगी मगर भैजी जनता में गुस्सा इस लायक नहीं रहेंगे। खैर एम्स में बच्चों के इलाज पर मोटी रकम खर्च हो रही है। इधर डीएम टिहरी ने नियमानुसार घायलों को दस-दस हजार के चेक दे दिए हैं। मृतक परिजनों केा एक-एक लाख दिए है। खैर जो अस्तपताल में जीवन व मृत्यु से जूझ रहे हैं उनकी बात करें। मुख्यमंत्री ने इतना तो करते कि उनका इलाज फ्री करवा देते। कुछ नहीं बस अपना उल्लू कैसे सीधा हो इसी गणित में उलझे रहो। बेषर्मों को षर्म कैसे। नंगे नाचो और दूसरों को कहो गज भर का घूंघट ओढ के रखो। मुख्यमंत्री की इस हरकत ने पौडी-टिहरी वाद जैसे बीज भी बो दिए हैं। टिहरी में चर्चा है कि धूमाकोट में वाहन दुर्घटना हुई तो मुख्यमंत्री मौके पर पहुंचे और मृतक परिजनों को पांच-पांच लाख बांटे। घायलों को ढाई-ढाई। मात्र यही नहीं सवाल यह भी उठा कि डोईवाला में श्रीमद भागवत, गल्दू-बल्दू के बच्चे के नामकरण और मंुडन में सीएम साहब पहुंच रहे हैं मगर रोते परिवारों को सांत्वाना देने की उनके पास फुर्सत नहीं है। बहरहाल धारा 370, भाजपा सदस्यता अभियान, देवप्रयाग के अलावा अन्य जगह षराब का कारखाना, सतपुली में भांग की खेती जैसे काम करने हैं। उत्तराखंड में भंगला जमाना है। इतने बडे-बडे कामों के चलते फुर्सत कहां है। खैर उत्तराखंड बना ही नेताओं और अफसरों के लिए है मगर टिहरी में रोती मां और बहन के आंसू सीधे सरकारी खाते में ही जमा हो रहे हैं।