NGT के हवाले इको सेंसिटिव जोन, सरकार की बढ़ेगी मुश्क‌िल

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acr468-54e4db344b36ehighउत्तरकाशी में इको सेंसिटिव जोन (संवेदी क्षेत्र) घोषित करने का मामला हाईकोर्ट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को रेफर कर दिया है। बृहस्पतिवार को मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने यह फैसला किया।

मामला एनजीटी के पास जोन से सरकार की परेशानी बढ़ेगी। प्रदेश से संबंधित अब तक के मामलों में एनजीटी का रुख सख्त रहा है। ऐसे में संवेदी क्षेत्र को लेकर हुई लापरवाही सरकार पर भारी पड़ सकती है।

बृहस्पतिवार को मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। उत्तरकाशी निवासी लोकेंद्र बिष्ट ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार की ओर से 18 दिसंबर, 2012 को अधिसूचना जारी कर उत्तरकाशी को संवेदी क्षेत्र घोषित कर दिया गया, जो गलत है।

मामला एनजीटी के पास जाने से उत्तरकाशी संवेदी क्षेत्र में सरकार की गर्दन क्षेत्रीय महायोजना को लेकर फंस सकती है। संवेदी क्षेत्र की 2012 में जारी अधिसूचना में साफ कहा गया था कि सरकार दो साल के अंदर क्षेत्रीय महायोजना तैयार करेगी।

इस महायोजना में यह स्पष्ट किया जाएगा कि प्रभावित होने वाले लोगों के हक हकूक क्या हैं और उनके अधिकार किस तरह से संरक्षित रह सकते हैं। पर तीन साल बीत जाने के बाद भी यह महायोजना तैयार नहीं हो पाई। अब यह तय किया गया है कि महायोजना का निर्माण प्रदेश की विभिन्न विशेषज्ञ संस्थाओं के सहयोग से किया जाएगा।

जाहिर है कि एनजीटी में सरकार को इस बात को लेकर भी जवाब देना पड़ सकता है कि आखिर क्षेत्रीय लोगों के हक हकूक परिभाषित क्यों नहीं किए गए। याचिका में भी स्थानीय लोगों के अधिकार प्रभावित होने का जिक्र किया गया है।

पर्यावरण के प्रदेश से संबंधित इससे पहले के मामलों में ट्रिब्यूनल का रुख भी खासा सख्त रहा है। हरिद्वार और देहरादून में ही खनन वाले मामलों में ट्रिब्यूनल ने सरकार को कड़ा आदेश जारी किया था।

इसी तरह गंगा की स्वच्छता के मामले में एनजीटी ने सरकार की लापरवाही पर कड़ी फटकार लगाई थी।

विवादित रहा है यह मामला
उत्तरकाशी संवेदी क्षेत्र का मसला शुरू से ही विवादित हो गया था। प्रदेश सरकार इस अधिसूचना को रद्द करने की मांग केंद्र से लगातार करती रही है। इसकी जद में उत्तरकाशी जिले के गोमुख से लेकर उत्तरकाशी तक के 88 गांव आ रहे हैं और लोगों को डर हैं कि संवेदी क्षेत्र होने की वजह से उनके हक हकूक प्रभावित होंगे।

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