प्रीति ने जगाई प्रेरणा की अलख, तुलसी की खेती से रूक सकता है पहाड़ों में पलायन

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  • नीरज उत्तराखंडी कुमारी प्रीति एक गरीब परिवार की बालिका है। सरकारी विद्यालय में पढ़ती है। प्राथमिक विद्यालय छाडा से कक्षा पांच उतीर्ण कर वह एवं उसकी सहेली कुमारी अंजलि ने प्राइवेट विद्यालय पर विश्वास न कर सरकारी विद्यालय पर भरोसा जताया । घरेलू परिस्थितियां किसी को बर्बाद कर देती हैं तो वहीं किसी को महान बनने की सीख दे जाती है,ऐसा ही कुछ शायद प्रीति के साथ भी  हुआ है ।प्रीति ने अपने अध्ययन के साथ ही बाल विज्ञान कांग्रेस में प्रतिभाग किया।
    वर्ष 2015 ,2016 और 2017 में राज्य स्तर के लिए इनकी परियोजना चयनित होती रही । 2015 में जलवायु परिवर्तन एवं मौसम के अंतर्गत “लाल चावल का घटता उत्पादन” विषय पर 2016 में संधारणीय विकास हेतु नवाचार के अंतर्गत “वनौषधी “तथा 2017 में संधारणीय विकास हेतु नवाचार विषय के अंतर्गत “घरेलू जड़ी बूटियों “पर शोध प्रस्तुत किया।
    प्रीति के शोध का उद्देश्य है कि गांव में गरीब लोग रहते हैं जो अपना उपचार महंगे एलोपैथिक दवाइयों से नहीं कर पाते हैं ।जिसके कारण वह असमय ही काल ग्रास हो जाते हैं। उनके लिए मुफ्त में घरेलू जड़ी बूटी अतीस,  कोडाई ,नारियल की जटा, लहसुन,अजवाइन ,तुलसी ,पुदीना ,नीलकंठी,पितमारू, पत्थरचट्टा, अदरक आदि अनेक जड़ी-बूटी व पारंपरिक ज्ञान पद्धतियों  पर शोध किया ।
    हमारे पूर्वज पारम्परिक भोज्य पदार्थों जैसे बाड़ी  ,सीड़े ,ढिडके ,अस्के ,मट्ठा ,चूल्हे की रोटी, कुल्थाड़ी भटवाणी ,कंडाली की सब्जी और न जाने क्या क्या प्रयोग करते थे ।जिससे वह सदैव सुखी जीवन यापन करते थे ।
    प्रीति का मानना है कि आज विज्ञान ने बहुत प्रगति की है लेकिन बीमारियां भी उसी गति से क्यों वृद्धि कर रही हैं । कहीं न कहीं हमारी पारंपरिक जीवन शैली ज्ञान पद्धति बाधित हुई है। हमने अपने पारंपरिक पद्धति को बदल दिया है ।  प्रीति ने तुलसी पर शोध किया और पाया कि  तुलसी से लगभग दो सौ बिमारियों का उपचार हो सकता है ।प्रीति  का प्रयास है कि गांव में पलायन रोजगार के लिए अधिकांश होता है ।
    यदि हम तीस हजार का तुलसी का बीज लगाएं तो हमें 1 वर्ष में कम से कम तीन से चार लाख की आमदनी होती है ।तुलसी अदरक की खेती करें तो हम स्वस्थ रहेंगे साथ ही आर्थिकी मजबूत होगी । जिससे  पहाड़ों से पलायन पर भी रोक लग सकती है।
    मार्गदर्शक शिक्षक चंद्रभूषण बिजल्वाण ने कहा कि प्रीति ने राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय सुनाली सहित ब्लाक जनपद व राज्य का नाम रोशन किया है। प्रीति गुरुजनों का कहना मानती है इसी के साथ वह गंभीर एवं लग्नशील है।प्रीति की विज्ञान के प्रति रूचि व वैज्ञानिक दृष्टिकोण   ही  उस की कुछ विशेषताएं हैं जिस की वजह से वह यहां तक पहुँची । बसन्त मेले गंगनानी मे  माननीय मुमुख्यमंत्री  त्रिवेन्दर्  सिह रावत  जी ने बालिका को सम्मानित किया ।इस उपलब्धि  पर पुरोला  विधायक श्री  राजकुमार,खंड शिक्षा अधिकारी चतर सिंह चौहान, उप शिक्षा अधिकारी डी पी  पांडे, बीआरसी महिदेव असवाल एवं  न्याय पंचायत समन्वयक जगवीर सिंह  रावत,जगदीश नौटियाल,प्यारे लाल  भारती, श्याम लाल गौतम, विधालय परिवार  के प्रधानाचार्य  श्रीराम सिह चौहान,भजन सिह रावत,  सरोजनी  रावत,    शैलेन्द्री नेगी  ,आनन्द मणी जगुड़ी ,भोजन माताऐ- सरोज , अचपाली देवी , प्रधान प्रेमलाल ,पूर्व प्रधान सोबेद्र सिंह राणा,शिव प्रसाद नौटियाल,वीरेन्द्र सिंह  चौहान सहित प्राथमिक शिक्षक संघ, जूनियर हाई स्कूल शिक्षक संघ ,राजकीय शिक्षक संघ, विद्यालय परिवार  सहित क्षेत्र के  तमाम लोगोें ने प्रीति को शुभकामनाएं एवं बधाई दी ।

तुलसी के औषधीय गुण   तुलसी के बीज ,पतियां व डण्ठल विभिन्न बीमारियों में प्रयोग किए जाते हैं तुलसी चटपटी ,कड़वी ,अग्नि दीपक हृदय की हितकारी गरम  पित वृद्धिकर मूत्रकृच्छ, कोढ़, रक्त विकार, पसली पीड़ा, तथा कफ ,वातनाशक है। पाश्चात्य मतानुसार श्वेत तुलसी उष्ण ,पाचक एवं बालकों के प्रतिश् याय व कफ रोगों में कार्यान्वित होता है। काली तुलसी शीत स्निग्ध कफ एवं ज्वरनाशक है ।फुसफुस के अंदर से कफ निकालने के लिए काली मिर्च के साथ तुलसी के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। तुलसी रोगाणुनाशक पौधा है। प्राय सभी हिंदू घरों में यह मिल जाता है और इसकी पूजा की जाती है।
केवल क्षयऔर मलेरिया के कीटाणु ही तुलसी की गंध से समाप्त नहीं हो जाते हैं अन्य रोगों के कीटाणु  भी नष्ट हो जाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व मलाया में मलेरिया की अधिकता को देखकर वहां की सरकार ने पार्कों में वनों में खाली जमीन जहां भी थी वहां तुलसी के पौधे रोपने का एक जोरदार अभियान चलाया था उसके परिणाम स्वरुप महामारी के रूप में कुख्यात मलेरिया धीरे-धीरे कम होते हुए अब बिल्कुल समाप्त हो गया है ।वहां के निवासियों तुलसी के गुणो से भली भांति परिचित हो चुके हैं।आज उनके घरों में तुलसी के पौधे दिखाई देते हैं। अनेक होम्योपैथिक दवाइयों में तुलसी के रस का प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद के मतानुसार यदि कार्तिक मास में प्रातः काल निराहार तुलसी के पत्तों का सेवन किया जाए तो मनुष्य वर्षभर रोगों से सुरक्षित रहता है। तुलसी रक्त विकार का सबसे बड़ा शत्रु है किसी भी कारण से विकार उत्पन्न हो गए हो तो तुलसी के नियमित प्रयोग से वह विष रक्त से निकल जाता है तुलसी के पौधे आंखों की ज्योति और मन को शांति प्रदान करते हैं ।तुलसी हिचकी ,खांसी ,विष विकार ,पसली के  रोग को मिटाने वाली होती है। इस से पित्त की वृद्धि और दूषित कफ   व वायु का शमन होता है। भाव प्रकाश में तुलसी को रोग नाशक, हृदयोष्णा, दाहिपितकृत शक्तियों के संबंध में भी  लिखा गया है ।  तुलसी में सर्दी जुखाम से लेकर पेट दर्द, मूत्र विकार यहां तक की कैंसर जैसी बीमारी भी तुलसी के सेवन से ठीक हो जाती है। तुलसी को औषधियों की रानी कहा जाता है। तुलसी में एंटीबैक्टीरियल, एंटीवायरल, ऐंटिफंगल ,एंटी फ्लू ,एंटीऐजिंक, एंटीसेप्टिक, एंटीइंफ्लेमेटरी ,एंटीडिजिज जैसे औषधीय गुण  पाये जाते हैं ।

प्रीति के विचार-मेरी प्रारंभिक शिक्षा राजकीय प्राथमिक विद्यालय छाड़ा से शुरू हुई । तब मैं बहुत छोटी थी और कुछ भी पढ़ना लिखना नहीं जानती थी। इसलिए हमारी मैडम हमें प्यार से पढ़ाती थी। हमें कई अच्छी बातें सीखाती थी कि हमें अनुशासन में रहना चाहिए ,बड़ों का कहना मानना चाहिए, बड़ों का आदर करना चाहिए ,ऐसी शिक्षा हमें देती थी। यही कक्षा एक की  यदि पढ़ने लिखने की बात की जाए तो हम केवल गिनती अक्षरों को पढ़ना – लिखना और पढ़ना सीखाया जाता था।यह सब  हमें बहुत अच्छा लगता था । इस तरह हम बड़े होते गए और आगे की कक्षा में बढ़ते गये । जब तक हम छोटी कक्षा में थे तब तक हम गिनती पहाड़े जोड़ घटाना गुणा भाग  को पढ़ते और समझते थे। हिंदी में प्रश्न उत्तर, कविताएं लिखना, उन्हें याद करना ,श्रुतलेख लिखना आदि कार्य करते थे । पढ़ाई का अधिक भार हम पर नहीं था । हम मध्यान्तर होने के बाद खेलते रहते थे । हमारी अध्यापिका हमें खो-खो, कबड्डी व अन्य खेल खिलाती थी । हमारी अध्यापिका श्रीमती कौशल्या बिजल्वाण एवं श्रीमती संगीता रावत । हमें दोनों मैडम बहुत अच्छी लगती थी। हम अपनी अध्यापिकाओं को बड़ी मैडम वह छोटी मैडम कह कर पुकारते थे ।छोटी मैडम ज्यादा समझाती  थी और ज्यादा मारती भी नहीं थी । हमें उनसे ज्यादा डर भी नहीं लगता था। तो सब बच्चे कहते थे कि छोटी मैडम मारती नहीं है । परंतु जो हमारी बिजल्वाण बड़ी  मैडम थी वह सबसे अलग थी । वह हमें मारती भी  और समझाती  भी थी साथ ही बाद में प्यार भी करती थी। उस वक्त हम उनके मारने पीटने का कारण नहीं समझ पाए। परंतु उनका हमें मारना समझाना हमारे हित में था ।वह मुझे हमेशा कहती थी कि प्रीति तो अपना लेख सुधार , सुन्दर अक्षर लिखने की कोशिश कर , मैं कोशिश तो करती पर मैडम को पसंद नहीं आता था और जब मैं मैडम को अपनी कॉपी दिखाती तो मैडम मुझे गुड नहीं देती थी ।यही कोशिश करती की मैडम मुझे गुड दे लेकिन मैडम का कहना था कि बच्चों को ज्यादा लाड़ प्यार व उनकी ज्यादा तारीफ नहीं करनी चाहिए। इस तरह बच्चे बिगड़ जाते हैं। यह बात मुझे अब समझ आई जब मैंकक्षा 8 में पहुंच गई । उनकी दी  गई सीख हमें हमेशा याद रहेगी । मेरी शिक्षा यहीं से शुरू हुई। फिर मैंने कक्षा 5 की परीक्षा  उतीर्ण  कर राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय सुनाली में प्रवेश लिया। यहां 6 से 8 की कक्षाऐ थी। जब मैं यहां आई तो यह स्कूल मेरे लिए नया था यहां के अनुभव भी मेरे लिए नहीं थे । यहां आकर पढ़ाई का भार अधिक बढ़ गया। पहले तो हम बेसिक में पांच विषयों का अध्ययन करते थे परंतु यहां मुझे 8 विषयों को साथ लेकर चलना था । जो हम बेसिक स्कूल में नहीं सीख पाए उसी चीज को हमें यहां प्राप्त करना था। जो लापरवाही व गलती  हमने बेसिक में की उस गलती को मै यहां सुधारना चाहती थी। यहां के सारे शिक्षक व यहां पर शिक्षा  के प्रति जो माहौल था  वह पूरे क्षेत्र मे चर्चा  का विषय था ।जब मैं यहां आई तो मैं सिर्फ बिजल्वाण सर को ही  जानती थी । वे पहले हमारे विद्यालय में भी आए थे ।वह मेरे सबसे आदर्श  टीचर थे ।मैअंत में यही सोचती थी कि जिस  तरह मैं और मेरी सहेली अंजलि बेसिक स्कूल में मैडम की प्रिय शिष्या थी तो क्या यहां भी हम गुरुजनों की प्रिय शिष्य बन पाएंगे। क्या मैं  यहाँ भी अपने बेस्ट टीचर की बेस्ट शिष्य बन पाउंगी? हम सब लोगों से मिलने लगे धीरे धीरे हम सभी शिक्षकों  केc विषय में जाने लगे कि वह कैसे हैं, कैसे पढ़ाते हैं , उनका पढ़ाने का तरीका कैसा है आदि हमे सभी अध्यापक बहुत अच्छे लगे ।  वहां के प्रधानाध्यापक सत्यपाल जी थे ।वह हमें अंग्रेजी विषय बहुत  अच्छे से पढ़ाते थे । सर को अंग्रेजी बिषय की बहुत अच्छी  जानकारी थी ।सभी शिक्षकों की पढ़ाने का तरीका अच्छा था। परंतु सिर्फ एक शिक्षक सभी शिक्षकों से अलग थे श्री चंद्र भूषण बिजल्वाण  इनकी बातें हमें बहुत अच्छी लगती हैं। इनका पढ़ाने का तरीका अद्भुत है यह हमें पढ़ाते कम है और समझाते ज्यादा हैं ।इनका एक ही कहना है कि किताबें पढ़ना ही शिक्षा नहीं है शिक्षा का अर्थ बहुत बड़ा है। जीवन जीने की कला भी शिक्षा है बात करने की कला भी शिक्षा है….शिक्षा  अनुभवों  का आदान प्रदान है संसार मे जो भी महान हुए हैं  वे सभी  शिक्षा,अनुभव  व ज्ञान  के माध्यम से  हुए  हैं ।सर    किसी भी परिस्थिति को समझाने के लिए जो तर्क व उदाहरण  देते हैं वह हमें बहुत भाते हैं हम सभी को इनके द्वारा  दिये गये तर्क व उदाहरण बहुत पसंद आते है । सभी छात्र इनके द्वारा दी गई शिक्षा को जीवन में उतारने की कोशिश  करते हैं ।