सेवा भाव भी और संगीत प्रेम भी, दोनों का साथ निभाती गायक आत्मप्रकाश की जिंदगी

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  • युवा गायक आत्मप्रकाश बमोला का संगीत प्रेम और सेवा भाव के क्या कहने
  • कालेज लाइफ से आया संगीत की दुनिया में टर्निंग प्वाइंट
  • व्यक्तित्व सराहनीय है तो कृतत्व अनुकरणीय

    मलखीत रौथाण

    लोक संगीत के प्रति दीवानगी इतनी कि आज भी सोते हुये गुनगुनाते हैं और सेवा भाव इतना कि चिकित्सा को पेशा बना लिया। दोनों अलग-अगल कार्यों के लिये वक्त निकालना आसान नहीं है लेकिन ये युवा ऐसे हैं कि दोनों कार्यों के लिये समय निकालते हैं। गीत लिखते भी हैं और गाते भी। दिल्ली में गंगा राम अस्पताल में सेवारत हैं और संगीत की पारखी सीखने को शास्त्रीय संगीत का कोर्स भी कर रहे हैं। अब ज्यादा मत सोचिये जी, ये होनहार युवा है चामी का लाल। आत्मप्रकाश बमोला इनका नाम हैं और स्वभाव ऐसा कि हर कोई इनका दीवाना हो जाये। खास बात यह है कि इनमें संगीत प्रेम के प्रति प्रेम भी हैं समाज के प्रमि सेवाभाव भी। आइये, जानते हैं कि भाई आत्म प्रकाश बमोेला के बारे में।संक्षिप्त परिचय

    उत्तराखंड के पौड़ी जिले के कल्जीखाल ब्लाक के अंतर्गत आता है गांव चामी। यहीं के वाशिंदे हैं आत्मप्रकाश बमोला। संगीत के प्रति प्रेम विरासत में तो नहीं मिला लेकिन इसे अपनी और उत्तराखंड की विरासत मानकर इस दिशा में कदम बढ़ाये। रामलीला मंचन से जुड़ने के कारण हुनर में निखार आता रहा। संगीत के प्रति टर्निंग प्वाइंट तब आया जब इस युवा ने उच्च शिक्षा की तरफ कदम रखे।
    इनके गीतों में प्रेम रस तो भरपूर है ही साथ ही सामाजिक ताने-बाने पर तंज और समाज की पीड़ा भी महसूस की जा सकती है।

ऐसे बढ़ता गया संगीत प्रेम

बात करीब 2000 की है। आत्म प्रकाश स्नातक करने राजकीय महाविद्यालय जयहरीखाल गये और वहां उन्होंने अपने हुनर का जमकर जादू बिखेरा। बस क्या था यहां पीछे मुडकर नहीं देखा। साल-2002 में तबला वादक सुभाष पांडेय के सहयोग से रामा म्यूजिक बैनर के तले नाज नखरा ओडियो कैसेट निकाली। यह ओडियो खूब चला। इसके बाद चिकित्सकीय प्रशिक्षण ग्रहण करने के चलते व्यस्तता बढ़ी और फिर साल-2007 में माया कु जोगी नया ओडियो बाजार में आया।

पांडवाज क्रियेशंस से जुडे़

संगीत की दीवानगी आत्म प्रकाश की आवाज और आंखों दोनों में देखी जा सकती है। वक्त निकालते हैं हर रोज रियाज के लिये और निरंतर लिखते भी हैं। स्टेज शो के अलावा आत्म प्रकाश वर्तमान में पांडवाज क्रियेशंस भी जुड़े और यहां के लिये गीत भी गाये हैं।

भावुक कर देता है ये गीत

यूं आत्मप्रकाश बमोला के सभी गीत स्तरीय और भावपूर्ण हैं। प्रेम के गीतों में वेदना भी हैं तो उल्लास व उमंग भी। मसलन, तेरा बाना बौल्या बंणी छोरी, ह्वैं ग्यौं बदनाम है, तू त मिथैकि बिसरी गैई मी नि भूलि जांणू हे। गजब की प्रेम वेदना है इस गीत में। इसके अलावा मां की ममता, महिमा और गरिमा का एक गीत सचमुच भावुक कर देता है। मतलबी लोेग इख, मतलब प्यार च, कनक्वैंकि रैंणा मिना हे मां तेरा बगैर।

लोक संगीत की वर्तमान दिशा से नाखुश हैं आत्मप्रकाश

युवा गायक व गीतकार आत्मप्रकाश बमोला लोक संगीत की वर्तमान दिशा से नाखुश हैं। वे कहते हैं कि अब गीत रचना और गायन पश्चिम के रंग में रंग रहा है। लोक संगीत का वास्तविक स्वरूप गीतों व गायन से गायब होता जा रहा है। डीजे की संस्कृति के प्रति बढ़ता युवाओं की रूझान ठीक नहीं है।