यूसीसी पर बढ़ता विरोध, जन संगठनों ने किया एक महीने के आंदोलन का ऐलान

यूसीसी से महिलाओं की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर बढ़ेगा खतरा

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विभिन्न जन संगठनों की घोषणा


उत्तराखंड में यूसीसी के खिलाफ जन आंदोलन की रणनीति तैयार, अप्रैल में बड़े प्रदर्शन की योजना

देहरादून। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उत्तराखंड के विभिन्न संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के खिलाफ एक व्यापक जन आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया। देहरादून में आयोजित इस बैठक में राज्य के कोने-कोने से आए संगठनों ने एकजुट होकर यूसीसी

को महिला विरोधी, संविधान विरोधी और जन विरोधी करार देते हुए इसे रद्द करने की मांग की।

बैठक में तय किया गया कि 11 से 14 अप्रैल तक प्रदेशभर में धरना प्रदर्शन किए जाएंगे। साथ ही, अगले एक महीने तक हस्ताक्षर अभियान और जन सभाओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाएगा। संगठनों ने यह भी ऐलान किया कि यूसीसी की वैधानिकता को न्यायालय में चुनौती देने की कानूनी प्रक्रिया भी जारी रहेगी।

यूसीसी

यूसीसी से महिलाओं के अधिकारों पर खतरा

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड सरकार को यूसीसी कानून लागू करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 स्पष्ट करता है कि यह कानून पूरे देश के लिए संसद द्वारा बनाया जाना चाहिए, न कि किसी राज्य सरकार द्वारा।

वक्ताओं ने यूसीसी के उन प्रावधानों पर भी सवाल उठाए, जो निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के पुट्टा स्वामी जजमेंट में कहा गया था कि आधार कार्ड का उपयोग केवल सरकारी योजनाओं के लिए किया जा सकता है। लेकिन यूसीसी में विवाह, तलाक, वसीयत और लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण के लिए आधार नंबर और मोबाइल नंबर को अनिवार्य बना दिया गया है। साथ ही, पंजीकरण न कराने पर सरकारी योजनाओं से वंचित करने का प्रावधान भी रखा गया है, जो संविधान के मूलभूत अधिकारों का हनन करता है।

विवाह और लिव-इन संबंधों के लिए सख्त नियम

यूसीसी नियमों के सेक्शन 8 के तहत,

  • 2010 से पहले और 2010 से 27 जनवरी 2025 के बीच हुए विवाहों को छह महीने के भीतर पंजीकृत कराना अनिवार्य है।
  • 27 जनवरी 2025 के बाद हुए विवाहों के लिए 60 दिनों के भीतर पंजीकरण करना जरूरी होगा।
  • जिनकी शादी, लिव-इन रिलेशनशिप, तलाक या जीवन साथी की मृत्यु 50-60 साल पहले हो चुकी है, उन्हें भी 16 पन्नों का पंजीकरण फॉर्म भरना पड़ेगा।

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि यह वरिष्ठ नागरिकों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए बेहद कठिन प्रक्रिया होगी, जिससे उनके लिए अनावश्यक परेशानियां खड़ी होंगी।

युवाओं और महिलाओं के अधिकारों पर खतरा

यूसीसी से अंतरधार्मिक और अंतरजातीय विवाह करने वाले युवाओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। इससे ऑनर किलिंग की घटनाओं में वृद्धि होने की आशंका भी जताई गई। वक्ताओं ने कहा कि यह कानून महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने के बजाय मुस्लिम और अन्य धर्मों की अच्छी प्रथाओं को प्रतिबंधित करता है।

राजनीतिक दलों और संगठनों का समर्थन

इस आंदोलन को कई संगठनों और राजनीतिक दलों का समर्थन मिला है। बैठक में उत्तराखंड महिला मंच, समाजवादी लोक मंच, समाजवादी पार्टी, चेतना आंदोलन, महिला किसान अधिकार मंच, तहंजीम ए रहनुमा ए मिल्लत, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, जागृति संस्थान, वन पंचायत संघर्ष मोर्चा, इंसानियत मंच, पूर्व बार काउंसिल अध्यक्ष रज़िया बैग, पीपल्स फोरम समेत कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा-ले) ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया।

अगले कदम
  1. 11 से 14 अप्रैल: राज्य के विभिन्न स्थानों पर धरना प्रदर्शन।
  2. अप्रैल-मई: जनसभाएं और हस्ताक्षर अभियान।
  3. न्यायालय में चुनौती: यूसीसी को रद्द करने के लिए कानूनी प्रक्रिया जारी रखी जाएगी।

संगठनों ने जनता से अपील की कि वे इस कानून के प्रभावों को समझें और इसके खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ बुलंद करें। उत्तराखंड में यूसीसी के खिलाफ यह जन आंदोलन आने वाले दिनों में और तेज़ होने की संभावना है।