उच्च शिक्षा  संख्या में अव्वल, गुणवत्ता में ढील

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डाॅ. सुशील उपाध्याय

संख्यात्मक दृष्टि से उत्तराखंड में उच्च शिक्षा की हालत काफी बेहतर है। प्रदेश में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय, 10 राज्य विश्वविद्यालय, तीन डीम्ड विश्वविद्यालय, 11 निजी विश्वविद्यालय और तीन राष्ट्रीय महत्व की शैक्षिक संस्थाएं मौजूद हैं। प्रदेश की एक करोड़ की आबादी के लिहाज से देखें तो औसत पौने चार लाख की आबादी पर एक विश्वविद्यालय मौजूद है। साल 2014.15 तक 93 राजकीय डिग्री काॅलेजों समेत 427 काॅलेज प्रदेश में खुल चुके हैं। यानि ढाई हजार से भी कम की आबादी पर एक काॅलेज मौजूद है। राष्ट्रीय आंकड़े इनसे बहुत पीछे हैं। पिछले साल उत्तराखंड में उच्च शिक्षा में तीन लाख 36 हजार से
अधिक छात्र-छात्राएं पंजीकृत थे। प्रदेश में उच्च शिक्षा के पंजीकरण का प्रतिशत भी राष्ट्रीय प्रतिशत की तुलना में करीब डेढ़ गुना अधिक है। प्रदेश गठन के बाद से अब तक के 15 साल में ये संख्या दोगुने से भी अधिक हो गई है। इस अवधि में उच्च शिक्षण संस्थाओं का आंकड़ा तीन गुना से भी ज्यादा हो गया है। लेकिन, ये तस्वीर का सकारात्मक पहलू है। पर, इस तस्वीर का दूसरा पहलू बताता है कि प्रदेश गठन के बाद स्थापित विश्वविद्यालयों में से आधों के पास अपने भवन नहीं है। नए खुले विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के करीब 75 प्रतिशत खाली हैं। पूरे प्रदेश में 10 विश्वविद्यालयों के लिए केवल दो ही नियमित रजिस्ट्रार हैं। यही हाल परीक्षा नियंत्रक, डिप्टी रजिस्ट्रार और दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर है। ज्यादातर संस्थाएं तदर्थ और कार्यवाहक व्यवस्था के तहत चल रही हैं। अभी तक सरकार के पास ऐसी कोई योजना नहीं है, जिससे ये पता चल सके कि अगले पांच साल बाद ये विश्वविद्यालय किस मुकाम पर होंगे।
इससे भी बड़ी बात यह है कि इस साल पहले प्रदेश में राजकीय डिग्री काॅलेजों में छात्र-शिक्षक का जो अनुपात 1रू77 था, आज वो बढ़कर 1रू145 हो गया है। कल्पना कीजिए कि उच्च शिक्षा में एक शिक्षक किस प्रकार 145 बच्चों का भविष्य संवारता होगा। राजकीय डिग्री काॅलेजों में खाली पदों की संख्या 50 फीसद से भी ज्यादा हो गई है। प्रदेश बनने के बाद से सरकार ने हर तीसरे महीने नए राजकीय डिग्री काॅलेज की स्थापना की है, लेकिन इनके लिए बुनियादी ढांचा खड़ा करने पर ध्यान नहीं दिया। इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि 93 राजकीय डिग्री काॅलेजों में से केवल 44 काॅलेजों के पास अपनी बिल्डिंग है। लैब, लाइब्रेरी, क्लास रूम, खेल मैदान जैसी
सुविधाएं अब भी दूर की कौड़ी बने हुए हैं।
सरकारी काॅलेजों और विश्वविद्यालयों में सुस्ती के आलम का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय उच्च्तर शिक्षा योजना के तहत राज्य के केवल तीन विश्वविद्यालयों और 28 काॅलेजों को ही मदद मिल सकी है। जबकि केंद्र सरकार तमाम संस्थाओं को पैसा देने को तैयार थी। लेकिन, प्रदेश के विश्वविद्यालयों और काॅलेजों में ऐसे लोग ही नहीं थे जो रूसा के लिए प्रोजेक्ट तैयार कर सकें और अपनी
संस्थाओं की जरूरत को केंद्र सरकार के सामने साबित कर सकें। पिछले कुछ समय में उच्च शिक्षा को लेकर राजभवन और सरकार ने कुछ कदम उठाएं हैं। इनके तहत हरेक तीन महीने पर राज्यपाल द्वारा कुलपतियों के साथ समीक्षा बैठक की जा रही है। उच्च शिक्षा मंत्री के अलावा मुख्य सचिव भी बैठकों के जरिये विश्वविद्यालयों और काॅलेजों को परख रहे हैं। हाईकोर्ट के दखल के बाद हाजिरी की बायोमैट्रिक व्यवस्था लागू की गई है। सरकार ने उच्च शिक्षा की चुनौतियों को भी चिह्नित किया है। इन चुनौतियांें को अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में मुख्य सचिव के साथ बैठक में अंतिम रूप दिया गया। लेकिन, उच्च शिक्षा की हालत को देखकर लगता है कि सरकार की अब तक की तमाम कोशिशें नाकाफी हैं। सरकार उच्च शिक्षा के लिए रोड-मैप तैयार करने की बात कर रही है, जबकि लोग धरातल पर परिणाम की बाट जोह रहे हैं।

 

सुधर सकते हैं हालात, बशर्ते

प्रदेश् के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थाओं में कई स्तरों पर सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। इनमें से कुछ प्रमुख बातें इस प्रकार हैं

 

  • विश्वविद्यालयों को वित्तीय, प्रशासनिक और अकादमिक मामलों में पूर्ण स्वायत्ता प्रदान 

की जानी चाहिए। राज्य के विश्वविद्यालयों में कुलसचिव और वित्त नियंत्रक जैसे केंद्रीकृत पदों के चयन को पूर्णतः विश्वविद्यालयों के
अधीन लाना चाहिए।

  • विश्वविद्यालयों की कार्य परिषद, विद्या परिषद और वित्त परिषद के गठन और उनके निर्णयों को लागू करने के मामले में सर्वाेच्च अधिकार विश्वविद्यालयों के पास ही होने चाहिए।
  • विश्वविद्यालयों के साथ संबद्धता देने की मौजूदा व्यवस्था में शासन की भूमिका काफी बड़ी है, इसे कम किया जाना चाहिए।
  • सरकारी एवं निजी, सभी विश्वविद्यालयों के लिए नैक द्वारा मूल्यांकन एवं प्रत्यायन अनिवार्य किया जाना चाहिए। मूल्यांकन एवं प्रत्यायन की प्रक्रिया को संस्थागत और 

अकादमिक कार्यक्रमों, दोनों के मामले में लागू किया जाना चाहिए।

  • उच्च शिक्षा के मामले में निजी क्षेत्र पर सख्त निगाह रखने की जरूरत है। इनके मामले में निरंतर जांच और सूचनाओं की पुष्टि की भी आवश्यकता है। 
  • प्रत्येक विश्वविद्यालय को कम से कम एक क्षेत्र में ‘सेंटर आॅफ एक्सीलैंस’ के तौर पर 

विकसित किया जाना चाहिए।

  • विश्वविद्यालयों के अनुदान को उनकी 

उपलब्धियों के साथ से जोड़ा जाना चाहिए।

  • नए विश्वविद्यालयों की स्थापना की बजाय उनके आसपास के क्षेत्रों में विशिष्ट-अकादमिक क्षेत्रों पर आधारित कैंपस शुरू करने चाहिए।
  • राज्य के विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर के स्तर की नियुक्ति प्रक्रिया को केंद्रीकृत किया जाना चाहिए। इनके लिए राज्य लोक सेवा आयोग अथवा राज्य विश्वविद्यालयों की संयुक्त कमेटी को जिम्मा दिया जाना चाहिए ताकि नियुक्तियों पर सवाल उठने की गुंजायश न रहे। 
  • काॅलेजों की संख्या की बजाय, छात्रों की संख्या के आधार पर विश्वविद्यालय खोले जाने चाहिए।
  • शिक्षकों को अनुबंध के आधार पर रखना गलत परंपरा है, स्थायी शिक्षकों के होने पर ही उच्च शिक्षा में सुधार संभव होगा। 
  • सभी विश्वविद्यालयों में कौशल-आधारित लघुकालिक पाठ्यक्रम आरंभ किए जाने चाहिए।
  • सभी विश्वविद्यालयों में यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि एक छात्र किसी भी स्तर पर, किसी भी कक्षा में प्रवेश ले सके और जब जरूरत हो एक्जिट कर सके और पुनः प्रवेश ले सके।
  • परंपरागत पाठ्यक्रमों और मुक्त पाठ्यक्रमों को एक-दूसरे के पूरक के तौर पर संचालित किया जाना चाहिए। एक पद्धति से दूसरी 

पद्धति में आसानी से प्रवेश की अनुमति भी होनी चाहिए।

  • आॅनलाइन पाठ्यक्रमों के साथ-साथ अन्य सभी पाठ्यक्रमों के कुछ हिस्से को आॅनलाइन करना चाहिए। 
  • उच्च शिक्षा शिक्षण को प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ना चाहिए। अगले तीन साल में सभी काॅलेजों और विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा की पढ़ाई को प्रौद्योगिकी आधारित कर देना चाहिए। इस कार्य में सबसे बड़ी बाधा यह है कि विश्वविद्यालयों और डिग्री काॅलेजों में प्रौद्योगिकी आधारित शिक्षण के लिए समुचित बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं है।
  • नई उच्च शिक्षण संस्थाओं को बड़े शहरों की बजाय ग्रामीण इलाकों में खोला जाए।
  • पहाड़ी एवं जनजातीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षण 

संस्थाओं की स्थापना के लिए मौजूदा मानकों में छूट दी जाए।

  • ‘पढ़ाई के साथ कमाई’ जैसी योजनाओं को तुरंत लागू करना चाहिए। स्नातक, स्नातकोत्तर स्तर के छात्र-छात्राओं को 

लाइब्रेरी, लैब, कार्यालयों और शिक्षणोत्तर गतिविधियों में आंशिक रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है।

  • रोजगार बढ़ाने के लिए उच्च शिक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता पर रखना चाहिए। विश्वविद्यालयों को ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए जो 

सीधे तौर पर कौशल-आधारित रोजगार से जुड़े हों।

  • विश्वविद्यालयों को सांस्कृतिक-सांप्रदायिक एकीकरण पर आधार-पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए और इन्हें सभी उपाधियों में अनिवार्य तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक एकीकरण के लिए स्नातक एवं स्नातकोत्तर के छा़त्र-छात्राओं को अपनी उपाधि का एक हिस्सा देश के किसी दूसरे हिस्से के विश्वविद्यालय में पूरा करने की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए।
  • सभी विश्वविद्यालयों में प्राचीन एवं लघुप्रायः भाषाओं के लिए अलग केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए।
  • उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी को सीमित रखा जाना चाहिए। निजी क्षेत्र का पूरा जोर लाभ कमाने पर है, जबकि उच्च शिक्षा का क्षेत्र लाभ के लिए नहीं है। 
  • निजी क्षेत्र द्वारा विश्वविद्यालय खोलना तभी ठीक होगा, जब वे सरकारी संस्थाओं के बराबर फीस लें।
  • विश्वविद्यालयों में शुल्क के स्लैबों को ज्यादा तार्किक बनाने की जरूरत है। शुल्क के दो स्लैब होने चाहिए। जो आर्थिक तौर पर संपन्न हैं, उनसे 

अधिक शुल्क लिया जाना चाहिए।

  • विश्वविद्यालयों को अपने स्तर पर व्यापक सर्वे करना चाहिए कि उनके क्षेत्र के उद्योगों, निजी क्षेत्र एवं विभिन्न पेशों के लिए किस प्रकार के प्रशिक्षित लोगों की जरूरत है।
  • उच्च शिक्षा में सभी स्तरों के पाठ्यक्रम को पुनरावलोकित किया जाना चाहिए। इस कार्य में पूर्व छात्रों का भी सहयोग लिया जाना चाहिए।

 

 विश्वविद्यालयों  से जोड़ी जाएं अकादमी

college 4उत्तराखंड के गठन के बाद से प्रदेश में विभिन्न भाषाओं के संरक्षण-संवर्द्धन के लिए पांच अकादमियों की
स्थापना की गई है। इनमें से संस्कृत अकादमी को अपवाद मान लें तो अन्य सभी मृत प्रायः हैं। हिंदी अकादमी, भाषा संस्थान, पंजाबी अकादमी और उर्दू अकादमी के ज्यादातर काम कागजों पर ही हैं। इन अकादमियों की स्थापना के पहले दिन से यह सवाल बना हुआ है कि ये कितने दिन जिंदा रह पाएंगी ? इस सवाल की बड़ी वजह इन अकादमियों का कार्मिक ढांचा और बजट है। सरकार ऐसी स्थिति में नहीं है कि अकादमियों के लिए भवन खड़े कर सके, अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन तथा योजनाओं के लिए खुले हाथ से पैसा दे सके। औसतन हरेक अकादमी सालाना एक से दो करोड़ की मांग सरकार के सामने रखती है।
राजनीतिक कारणों से इन अकादमियों को बंद करना भी आसान नहीं है। ऐसे हालात में यह सवाल प्रासंगिक है कि इन्हें जिंदा रखने और सक्रिय करने के लिए क्या किया जा सकता है ? सरकार चाहे तो इसका आसान समाधान संभव है। यह समाधान भी सरकार के हाल के एक फैसले से ही निकलता दिख रहा है। पिछले दिनों उत्तराखंड की नाट्य अकादमी को प्रस्तावित अल्मोड़ा विश्वविद्यालय के साथ जोड़ने का फैसला किया है। अब, सरकार को अपने इस फैसले को विस्तार देते हुए अन्य अकादमियों को भी विश्वविद्यालयों से जोड़ने की आवश्यकता है। इस काम को अमलीजामा पहनाना कतई मुश्किल नहीं है। अकादमिकयों के ढांचे को आसानी से विश्वविद्यालयों के साथ संबद्ध किया जा सकता है। सभी अकादमियों में मुख्यमंत्री पदेन अध्यक्ष होते हैं। इनके बाद उपाध्यक्ष और सचिव/निदेशक का पद होता है। यदि, अकादमियों को विश्वविद्यालयों से जोड़ा जाता है तो संबंधित कुलपति को पदेन उपाध्यक्ष, रजिस्ट्रार को पदेन सचिव, वित्त नियंत्रक को पदेन
वित्ताधिकारी बनाया जा सकता है। इसी प्रकार दोनों
संस्थाओं में शोध अधिकारी, प्रकाशन अधिकारी, पुस्तकालयाध्यक्ष के पद भी हैं। इन पदों का जिम्मा भी विश्वविद्यालय में कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष और शोध एवं प्रकाशन अधिकारियों को दिया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि विश्वविद्यालय और संबंद्ध अकादमियों में दोहरे स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि अकादमियों को विश्वविद्यालयों में विलय कर दिया जाएगा, बल्कि अकादमियों की अपनी कार्य-समिति या प्रबंध-समिति स्वतंत्र तौर पर काम करती रह सकती है। जहां जरूरी हो वहां अकादमियों के काम को विश्वविद्यालय की विभिन्न समितियों के जरिये भी किया जा सकता है।
चूंकि, सभी विश्वविद्यालय में शोध कार्य किए जा रहे हैं, इस लिहाज से अकादमियों को विशिष्ट शोध-केंद्र के तौर पर भी उपयोग में लाया जा सकेगा। इससे
शोधार्थियों को सीधा लाभ मिलेगा। यूजीसी लगातार इस बात पर जोर दे रही है कि सभी शिक्षक शोध-परियोजनाओं का हिस्सा बनें। चूंकि, अकादमियों के लक्ष्य में शोध-गतिविधियों को संचालित करना भी है, इस लिहाज से विश्वविद्यालयों के शिक्षक आसानी से शोध-परियोजनाओं का हिस्सा बन सकेंगे। उदाहरण के लिए यदि सरकार संस्कृत अकादमी को संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ जोड़ती है तो न केवल सभी रिक्त पद भरे हुए नजर आएंगे, वरन सभागार, गेस्ट हाउस और रिसर्च लाइब्रेरी जैसी विश्वविद्यालय की जरूरतें भी स्वतः ही पूरी हो जाएंगी। इसी प्रकार हिंदी अकादमी और उत्तराखंड भाषा संस्थान को भी दून विश्वविद्यालय, श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय या संस्कृत विश्वविद्यालय में से किसी के साथ जोड़ा जा सकता है। अभी तक हिंदी अकादमी और भाषा संस्थान के पास न अपना भवन, न कोई नियमित अधिकारी-कर्मचारी है और न ही कोई बुनियादी ढांचा है। ऐसे में इन दोनों संस्थाओं को उपर्युक्त में से किसी भी विश्वविद्यालय के साथ जोड़े जाते ही ये स्वतः सक्रिय नजर आएंगी। भाषा संस्थान को इसलिए भी संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ जोड़ा जा सकता है क्योंकि यह प्रदेश का अकेला विश्वविद्यालय है, जहां भाषा विज्ञान विभाग मौजूद है। उर्दू और पंजाबी अकादमी को ओपन यूनिवर्सिटी के साथ सबंद्ध कर सकते हैं। ओपन विश्वविद्यालय प्रदेश का एकमात्र विश्वविद्यालय है, जहां उर्दू में डिग्री संचालित की जाती हैं। हालांकि, पंजाबी भाषा में प्रदेश के किसी भी विश्वविद्यालय में कोई डिग्री संचालित नहीं होती, लेकिन इस कार्य को भी ओपन विश्वविद्यालय आसानी से अंजाम दे सकता है।
खास बात यह है कि अकादमियों को विश्वविद्यालयों से जोड़ने के लिए सरकार को किसी भी स्तर पर बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेगी और न ही कोई नया कानून बनाना पड़ेगा। इस कार्य को आसानी से कैबिनेट में निर्णय लेकर किया जा सकता है। यह निर्णय लेना इसलिए भी आसान है क्योंकि प्रदेश में उच्च शिक्षा और भाषा विभाग एक ही मंत्री के अधीन है। यानि, उच्च स्तर पर किसी प्रकार के फेरबदल की जरूरत नहीं होगी। अकादमियों को विश्वविद्यालयों से जोड़ने का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि भाषा, साहित्य, प्रकाशन आदि पर नई उपाधियां आरंभ की जा सकेंगी। मोटा अनुमान यह है कि अकादमियों के संचालन के कुल खर्च में 50 फीसद तक की कमी आ जाएगी और जिन विश्वविद्यालयों के साथ इन्हें जोड़ा जाएगा, उनके भी खर्च कम हो जाएंगे क्योंकि वे अकादमियों के संसाधनों का उपयोग कर सकेंगे।

 

 

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