उजड़ते गांवों का दर्द

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उत्तराखंड अलग राज्य बने यह उत्तराखंड की पूरी जनता का
जूनून था लेकिन राज्य बनने पर विकास का आधारभूत ढांचा तैयार करना प्रदेश की सरकारों और शासन का कभी भी जूनून नहीं बना। उत्तराखंड यहां के राजनैतिक दलों और नेताओं के लिये एक दुकान बना जो वोटों के लाभ हानि के हिसाब किताब के भंवर में भटकता चला आ रहा है। राजनीति ने उबड़-खाबड़ गांवों के भोले भाले निवासियों के चेहरे मोहरे देखने व पढ़ने की कोशिश नहीं की जिनसे पता चलता कि जो राज्य उत्तराखंड के गांववासियों के जुनून से जन्मा है उस की पीड़ा के पीछे कौन सी समस्यायें और कठिनाईयां छिपी हैं। लोक से जुड़ने का प्रयास उत्तराखंड की सरकारों ने कभी नहीं किया। कोलतार की काली सड़कों पर सरकार चलाने वालों और राजनेताओं ने सफेद झूठ बोल कर अपनी निम्न और तुच्छ मानसिकता की सोच तो उजागर की लेकिन राजनेताओं और सरकारी तंत्र ने गांव-गांव जाकर उत्तराखंड के अंतिम आदमी की न खोज की न सुध ली जिसकी समस्याओं का निदान होने से उत्तराखंड के गांवों की दशा सुधरती और एक दिशा मिलती…

 

सुप्रिया रतूड़ी

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उत्तराखंड के गांवों के अपने सपने थे जिसने राज्य आंदोलन का जुनून पैदा किया था। उन सपनों को पालने वाला, उन सपनों को पोशित करने वाला, उन सपनों को धरातल में उतारने वाला आज न कोई राजनैतिक दल है और न कोई नेता जिन्हें गांवों की जनता वोट देती आ रही है! सत्ता के समय-समय पर किये वायदों की बयार में सब कुछ बह गया है आष्वासनों की आक्सीजन और वायदों की विटामिन से यह प्रदेष कमजोर होता जा रहा है। विकास का पहिया गांवों तक नहीं जा रहा है। उत्तराखंड की पहचान गांवों को बसाओ, उनके हिस्से को भ्रश्टाचारियों का भोजन न बनने दो गांवों का हक षहरों से अधिक है, यह सरकार व षासन को नहीं भूलना चाहिये। गांवों को मूलभूत सुविधायें चाहिये। नेता, राजनेता, अफसर, नौकरषाह तो लूट से कमा रहे हैं लेकिन जनता पसीना बहा कर भी प्राप्त नहीं कर पा रही है। यदि डेढ दषक में प्रदेष की सरकारों व षासन की नीतियों से षराब उत्तराखंड के कोने-कोने व सुदूर अंचलों तक पहुंच सकती है तो विकास योजनायें उन क्षेत्रों में जाने से पहले ही रूक क्यों जाती है। इसका उत्तर सरकार योजना निर्माता व उसे कार्यान्वित करवाने वालों को खोजना व देना चाहिए। उजड़ते गांवों का उत्तराखंड बनेगा इसके लिये गांवों में राज्य आंदोलन का जुनून नहीं जन्मा था।

 

उत्तराखण्ड राज्य निर्माण आन्दोलन के मूल में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के पहाडी क्षेत्र के जिलों में दशकों से ठहरा हुआ विकास का पहिया था। इस क्षेत्र में बाहर से यहां आने वाले हर पूंजीपति, अधिकारी, बिचैलिये को समृद्धि दी किन्तु आम लोंगों की जिन्दगी कठिनतर होती गई 80 और 90 के दशकों में उत्तराखण्ड में कहावत प्रचलित थी कि सरकार के जो अधिकारी यहां अपनी गृहस्थी बिस्तरबन्द में समेट कर लाते थे, कुछ सालों की नौकरी में वे अपना सामान ट्रकों में लेकर जाते थे। चन्द वर्षों में बिस्तरबन्द का फूलकर ट्रक बन जाना किसी जादू से कम नहीं, वो भी धुर पहाड़ी इलाके जहां ट्रान्सफर पनिशमेन्ट पोस्टिंग माने जाते हों। स्थिति आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदली। अपनी स्थापना के सोलहवें वर्ष में प्रवेश कर चुके उत्तराखंड के सामने खाली होते गांव एक विकट हालात की झलक दिखा रहे हैं। उत्तराखंड से पलायन एकाएक नहीं हुआ। आजादी से पहले ही लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर जाने लगे थे। यह पलायन जीविका के लिए था। उन्हें यही महसूस हुआ कि गांव की बसाहट उन्हें जीने का आधार नहीं दे पा रही है। गांव में थोड़ी बहुत खेती, अच्छी आवोहबा , बाग-बगीचे जरूर हैं लेकिन कहीं कुछ विपन्नता का संकट था कि लोगों को पलायन करना पड़ा। वे अलग अलग दिशाओं की ओर बढ़े। दिल्ली और मुंबई जैसे शहर तो मानों उन्हें पुकार ही रहे थे। हालांकि मेजबान के तौर पर नहीं बल्कि अपनी जरूरतों को पहाड़ी लोगों से पूरा करने के लिए। उत्तराखंड से पलायन हुआ और बड़े-छोटे शहरों में लोग छोटे-छोटे कामों को करने लगे। यह उत्तराखंडियों का भीषण संघर्ष का दौर था। उन्हें अपनी गरीबी से जूझने के लिए उन हालातों से जूझना पड़ा। और इस बात का जतन करना पड़ा कि कुछ पैसा गांव में जरूर भेज सकें। यहीं से पहाड़ों में मनीआर्डर इकोनोमी की शुरुआत हुई। बेशक कुछ लोग सेना, शिक्षा, केंद्रीय संस्थाओं में सरकारी नौकरी भी पा गए। लेकिन उस दौर के पलायन से इतनी हलचल नहीं मची। हाल के तीन चार दशक में खासकर उत्तराखंड की स्थापना के बाद के समय में जिस तरह तेजी से पलायन हुआ और गांव के गांव खाली हुए, वह चिंताजनक है। उत्तराखंड के लिए यही अभिशाप है कि आज यहां ‘गावं वापस चलो’ के लिए आह्वान करना पड़ रहा है। होना तो यह था कि एक बेहतर राज्य बनने की दिशा में यह राज्य आगे बढ़ता। लोग अपनी जड़ों से जुड़ते। फिर गांव कस्बों की ओर आते युवाओं के लिए रोजगार के प्रबंध होते। गांवों की खुशहाली लौटती। मगर हुआ इसके विपरीत। गांव और बदहाल हो गए। तीन हजार गांवों में ताले पड़ गये। आज वहां दोपहर भी डरावनी लगती है। यह पलायन तेजी से होता रहा है। केवल गांव से ही पलायन नहीं हुआ। बल्कि पौड़ी, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ जैसे कस्बों हर जगह से लोग मैदानों की ओर निकले। शायद ही इस तरह का पलायन किसी प्रदेश में नहीं हुआ जिस तेजी से उत्तराखंड में हुआ। राज्य बनने के बाद यहां की भाजपा या कांग्रेस सरकारों ने ऐसे कदम नहीं उठाए जिससे लोगों में विश्वास का माहौल बनता। लोग अपनी जीविका के प्रति सोच पाते। गांव के खराब हालात, अच्छी शिक्षा का प्रबंध न होना, अस्पतालों का अभाव और तमाम बुनियादी सुविधाओं की कमी ने लोगों को जाने के लिए मजबूर कर दिया । गांव के हालात हर तरह से खराब हुए, न कमाने का कोई कारगर साधन था, नाही गुणात्मक शिक्षा और न ही स्वास्थ सुविधायें। उत्तराखंड बनने के बाद आयी हर सरकार का पूरा फोकस मैदानी क्षेत्रों तक सिमट गया। राज्य के आर्थिक नियोजन में जो थोड़ी बहुत हलचल हुई भी उसके केंद्र में गांव नहीं बल्कि देहरादून और दूसरे मैदानी इलाके थे। इसलिए लोग खिसकते-खिसकते शहरों की ओर आ गए । हालांकि यहां उनके लिए स्थिति और तंग थी। पर वो मान चुके थे कि अब पहाड़ों में जो कुछ है वह इससे बदतर है। उत्तराखंड के लिए नीति नियोजकों और राजनेताओं ने अपनी रानीति की धुरी जब देहरादून बनाई तो गैरसैंण को राजधानी बनाने का जो मकसद था, वह अपने आप गौण हो गये। नेताओं ने गांवों की तरफ पूरी तरह अरुचि दिखाई। देखा गया कि लोगों को ग्रामीण इलाकों के विधायकों तक अपनी समस्याओं को बताने के लिए भी देहरादून आना पड़ा। जब नेताओं ने ही अरुचि दिखाई तो नौकरशाहों से क्या अपेक्षा करते। प्रकृति के खेल ने भी उत्तराखंड के लोगों को कुछ कम नहीं डराया। देखा गया कि जब जब आपदा आई लोगों ने अपने को असहाय पाया। जिस शासन सत्ता के भरोसे लोग कहीं पर टिके रहते हैं, वह भरोसा दूर दूर तक नहीं दिखा। खासकर केदारनाथ की आपदा ने तो यही हालात पैदा किए कि क्या वास्तव में ऐसी मुसीबत के समय कोई सत्ता जिम्मेदार होती है। बार बार ऐसी स्थिति आई तो लोगों को ढहकते पहाड़ों के बीच रहना ठीक नहीं लगा। वह भरे भाव से अपने मुल्क को छोड़ने लगे। वह जाने लगे तो कोई यह कहने वाला भी नहीं था कि मत जाओ।
बार बार आपदा के संकट और उसके बाद घोर परेशानी के बीच सरकार के आपदा प्रबंधन की बात बेइमानी थी। राज्य बने 15 साल हुए लेकिन अभी तक हमारे राज्य में आपदा प्रबंधन का ठोस ढांचा नहीं है। इन हालातों ने लोगों को लाचार बनाया। समय के साथ बदलती धारणा के चलते भी लोगों ने गांवों को अलविदा कहा। उन्हें यही लगा कि गांव की सीमित जिंदगी में वो पिछड रहे हैं, कई चीजें उनके दायरे में नहीं आ पाती। उन्हें शहरों की ओर जाना ही चाहिए। वह देहरादून में या बाहर तंग हालात में रहने को ठीक माना लेकिन गांव छोड़ दिया। राज्य बनने के बाद राजनीतिक दल सत्ता की लड़ाई में उलझ गए और उधर गांव खाली होते रहे। पहाड़ों की इस दुर्दशा के लिए स्थानीय लोग भी जिम्मेदार है। गांव की जीवन शैली के अनुरूप ढलने के बजाय उन्होंने शहरों की ओर जाना ठीक समझा। कोई कभी कभार गांव लौटा, लेकिन किसी ने तो हमेशा के लिए गांव को अलविदा कह दिया। पलायन गढ़वाल कुमाऊं दोनों तरफ से हुआ । लेकिन कुमाऊं की अपेक्षा गढवाल में ज्यादा गांव वीरान हुए। पलायन हमेशा बुरा नहीं होता। कई बार पलायन करने वाली जाति समाज उन्नति करती है। और उनकी उन्नति का फायदा उस इलाके को मिलता है जिसे वह छोड़ आए। वह अपने ज्ञान अनुभव और धन के सामर्थ्य से अपने गांव का विकास करते हैं। वहां के जीवन स्तर को भी ऊंचा उठाते हैं। लेकिन इसके लिए दृढ इरादे और भावना की जरूरत होती है। उत्तराखंड के प्रवासियों ने अपने शुरुआती दौर में जो भी दुख सहे हों, लेकिन आज वो बहुत अच्छी स्थितियों में भी हैं। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी अपनी जगह है। बाहर रहते हुए वे समृद्ध भी हुए है। लेकिन दुभार्गय यही है कि ये प्रवासी अपने को पहाड़ की मूल भावना से नहीं जोड़ पाए। शहरों में रहते हुए सांस्कृतिक आयोजन करना और पहाड़ से आए नेताओं के साथ लाइजनिंग करना उनका मकसद रह गया। यहां भी पूरा समाज नहीं जुड़ा। इस तरह के प्रवासियों का अपना माटी से जुड़ना बहुत जरूरी था। इसका व्यापक फायदा मिलता। आज प्रवासी लोग कितने समृद्ध हुए और उनका प्रभाव बढ़ा इसे मुंबई के कौथिक आयोजन से समझा जा सकता है। कौथिक के एक हफ्ते के आयोजन में लाख दो लाख लोग आते हैं। इसी तरह दिल्ली की रामलीलाओं में भी लोगो की सहभागिता बनी रहती है। खासकर यह देखते हुए कि उत्तराखंड के लोगों ने दिल्ली और उत्तर भारत के शहरों में आकर रामलीला की परंपरा बनाए रखी। इन आयोजनों में उनकी प्रभावी उपस्थिति दिखती है। उन्होंने अपने को उठाया है, बावजूद इसके पहाड़ की स्थिति जस की तस हैं। बेशक वह अपनी मजबूरियों से मातृभूमि में न रह पाएं लेकिन उनका जुड़ाव किसी न किसी रूप में अपने गांव खेत खलियान के लिए होना चाहिए। वह गांव आते जाते रहे। इसे वीरान न करे। लेकिन ऐसा तभी होगा जब सरकार भी संवेदनशील हो। गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग के पीछे की भावना समझी जानी चाहिए। कोई भी अपने घर को नहीं छोड़ना चाहता। मजबूरी यहां-वहां भटकाती है। डेढ दशक जिस भी तरह से गुजरे, लेकिन आगे एक ठोस शुरुआत होनी चाहिए। गांवों को लेकर व्यवस्थित नीति बननी चाहिए। केवल नारों या शोरशराबे से नहीं पूरे तन्मयता से इसमें जुड़ना होगा। गांव फिर से आबाद हो, यह एक पक्ष के सरोकार नहीं, इसमें सबकी भागेदारी चाहिए। जिन्होंने अपनी पैतृक भूमि छोड़ी उनसे, जो अभी भी गांव में रह रहे हैं और जिस शासन सत्ता पर इसके प्रबंध की जिम्मेदारी है।उन सभी को पहाड़ को ‘‘पहाड़ की दृष्टि’’ से देखना होगा। विकसित देशों में पहाड़ी जीवन के संयोजन को समझना चाहिए। उससे सीखा जा सकता है। ऐसे गांव कस्बे जहां कम से कम बुनियादी सुविधाएं हो। रोजगार के प्रबंध हो, वहां लोग रुकेंगे। वापस भी लौट सकते हैं। फिलहाल गांव की ओर देखने का एक माहौल बना है, यह अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं। कुछ तो पत्थर अपनी जगह से हिला है।

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                                      नया भूमि बंदोबस्त जरुरी
उत्तराखंड में जमीन की सही स्थिति का आकलन करने के लिए नया भूमि बंदोबस्त जरुरी है। अगर हम इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो अंग्रेजों ने यहाँ अपने 132 वर्शों के षासनकाल में 11 बार भूमि बंदोबस्त कराया। सन् १८१५ में कुमाऊँ पर अंग्रेजों का अधिपत्य हो गया था। पहला भूमि बंदोबस्त अंग्रेज षासक ई. गार्डनर ने सन् १८१५-१६ में कराया था। उसके बाद कमिष्नर ट्रेल ने १८१७ में दूसरा, १८१८ में तीसरा, और १८२0 में चैथा भूमि बंदोबस्त कराया था। सन् १८२३ में पांचवां भूमि बंदोबस्त हुआ। तब संवत १८८0 होने के कारण इस बंदोबस्त को ‘‘अस्सी साला बंदोबस्त’’ के नाम से जाना जाता है। इस बंदोबस्त में पहली बार जमीन की नाप जोख के साथ गाँवों की सीमायें भी तय कर दी गई। आज भी दो गाँवों के बीच सीमा सम्बन्धी विवाद होने पर अस्सी साला बंदोबस्त के रिकार्ड से मदद ली जाती है। इसके बाद १८२९ में यहाँ छटा भूमि बंदोबस्त हुआ। सन् १८३0-३१ में प्राकृतिक आपदा से हुए भारी भूमि कटाव के बाद जनता की मांग पर सन् १८३२ में सातवाँ बंदोबस्त भी कमिष्नर ट्रेल द्वारा ही कराया गया। ट्रेल के बाद कुमाऊँ के कमिष्नर बने कर्नल गार्डनर ने सन् १८३४ में आठवां भूमि बंदोबस्त कराया। इनके बाद आये कमिष्नर बेटन ने सन् १८४२ से १८४६ के बीच नवां भूमि बंदोबस्त कराया। इस बंदोबस्त में आसामीवार फांट बनी और इन फांटों में हिस्सेदारों व खायकरों के हिस्से निर्धारित कर दिए गए। इस बंदोबस्त में भी गाँव की सीमाओं को लिपिबद्ध किया गया जिसे चकनामे के नाम से जाना जाता है। इसमें प्रधान, मालगुजार , सयाना व थोकदारों के दस्तूर भी कायम किये गए। सन् १८६३ से १८७३ के बीच बेकट
द्वारा दसवां बंदोबस्त कराया गया। इस बंदोबस्त में प्रत्येक गांव के नक्षे, खसरे, पर्चे बनाए गए। जमीन को तलाऊ, उपराऊ,अब्बल, दोयम, इजरान व कटील जैसी श्रेणियों में बांटा गया। बेकट ने कास्त भूमि के अलावा ऐसी भूमि को भी नपवाया जो भविश्य में काष्त के काम आ सकती हो। इस भूमि को बेपड़त भूमि कहा गया। यह कुमाऊँ का पहला वैज्ञानिक भूमि बंदोबस्त था, यह बिकट बंदोबस्त के नाम से प्रचलित हुआ। इसके बाद १८९९ से १९0२ के बीच कमीष्नर गूज ने ग्यारहवां बंदोबस्त कराया। आजादी के आंदोलन के तेज होते जाने के कारण अंग्रेज फिर बंदोबस्त नहीं करा पाए। इस तरह अगर हम देखें तो अंग्रेजों ने अपने षासन काल में उत्तराखंड में औसतन १२ वर्श में एक भूमि बंदोबस्त कराया। हालांकि उन्होंने यहाँ के ग्रामीण समाज में मौजूद सामंती भूमि संबंधों से कोई छेड़छाड़ किये बिना ही ये बंदोबस्त किये। आजादी के बाद सन् १९५६ में जमींदारी उन्मूलन कानून बना और इसके साथ ही नया भूमि बंदोबस्त षुरू हुआ। उत्तराखंड में यह कार्य सन् १९५८ से १९६४ के बीच हुआ। हालांकि इस बंदोबस्त में पक्के खायकारों-सिरतानों को यहाँ भूमि अधिकार दिए गए और मालगुजार-थोबदार-पधान जैसी पुरानी ब्यवस्थाओं को खत्म कर दिया गया, मगर भूमि संबंधों में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आया। इस दौर में भूमि बंदोबस्त पर यहाँ एक लोकगीत जन-जन में काफी लोकप्रिय हुआ जिसके बोल थे- ‘‘दिन में हैं छा खाना पूरी रात रबड़ घुस’’। यानी कि अमीन दिन में तो किसानों के सामने जमीन की नपाई की खानापूरी करता था मगर रात को मालगुजार दृ थोबदार के घर जाकर उसे रबर से मिटा देता था। जमीन के बड़े हिस्से पर अब भी इन पुराने मालगुजार दृ थोबदारों का ही कब्जा बना रहा और ग्रामीण दस्तकारी से जुड़ा यहाँ के षिल्पकारों (अनुसूचित जाति) की बहुसंख्या पूरी तरह भूमि पर अधिकार से वंचित कर दी गई। इस बंदोबस्त में भी पहाड़ में प्रचलित गोल खाता ब्यवस्था को समाप्त कर कलमी बटवारा नहीं किया गया जिसके कारण आज भी पहाड़ के हर गाँव में एक पूरी बिरादरी या खानदान का संयुक्त भूमि खाता है जिसे गोल खाता के नाम से जाना जाता है। इस गोल खाते में प्रत्येक खातेदार बटवारे में मिली अपने हिस्से की भूमि का स्वतंत्र खातेदार न होकर गोल खाते का एक हिस्सेदार दर्ज रहता है। इसके साथ ही खेती के अलावा किसानों व ग्रामीणों द्वारा चारे, चरागाह, पनघट, ईधन व लघु वन उत्पाद के लिए इस्तेमाल की जा रही सारी जमीनों को राज्य सरकार के नाम दर्ज कर ग्रामीणों के अधिकार से बाहर कर दिया गया। अगले भूमि बंदोबस्त के लिए ४0 वर्श की सीमा निर्धारित की गई जिसके अनुसार सन् २00४ में नया भूमि बंदोबस्त होना निष्चित था मगर अलग राज्य बन जाने के बाद भी हमारी सरकारें इसके लिए तैयार नहीं हैं। नया भूमि बंदोबस्त किये बिना न तो राज्य में भूमि की सही स्थिति का आकलन किया जा सकता है और न ही भूमि व कृशि को लेकर कोई सही नीति ही बनाई जा सकती है। साभार- कृशि क्षेत्र की उपेक्षा से बढ़ता पलायल पुस्तक

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