मौत के तांडव से पुजारी भयभीत, जवान कर रहे हैं अंतिम संस्कार

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देहरादून। महादेव के धाम केदारनाथ में मौत के तांडव से हर कोई भयभीत है। नतीजतन काल के ग्रास बने बदनसीब लोगों को मुक्ति दिलाने का साहस स्थानीय पुजारी नहीं जुटा पा रहे हैं। हरिद्वार में अंतिम संस्कार करने वाला पुरोहित समाज भी इस काम के लिए केदारनाथ जाने को तैयार नहीं।

आपदा राहत कार्यो में बढ़-चढ़कर भागीदारी करने वाले नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स [एनडीआरएफ] और उत्तराखंड पुलिस ने विपरीत परिस्थितियों में इस मोर्चे को भी संभाला। पुरोहित कार्य से जुड़े दो सुरक्षा जवानों ने धार्मिक विधि-विधान से धाम में श्रद्धालुओं के शवों का अंतिम संस्कार कराया।

काफी मिन्नतों के बाद गौरीकुंड के एक पुजारी ने इस काम के लिए हामी तो भरी, लेकिन बाद में वहां जाने से कदम पीछे खींच लिए। इस वजह से केदारनाथ में पहले दिन 18 शवों का अंतिम संस्कार के लिए पुरोहित कार्य करने वाले एनडीआरएफ और पुलिस के एक-एक जवान ने इस कार्य को अंजाम दिया। शवों की शिनाख्त, डीएनए सैंपल लेने को पुलिस उपमहानिरीक्षक संजय गुंज्याल के अगुआई में केदारनाथ धाम पहुंचे दल को वहां मुआयने के दौरान मलबे में दबी पुलिस चौकी में जनरल डायरी सलामत मिली। इसमें बाकायदा ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मचारियों का ब्योरा दर्ज था। दल को एसएलआर और थ्रीनॉटथ्री राइफल भी टूटी मिलीं।

दल ने वहां ब्लीचिंग पाउडर, गेमेक्सीन और कैमिकल्स का छिड़काव भी किया। अब नीलेश आनंद भरणे के नेतृत्व में 25 सदस्यीय टीम केदारनाथ रवाना की गई है। इसमें गुलदार के पुलिस कमांडो भी हैं। दल में शवों से डीएनए सैंपल लेने को तीन चिकित्सक, छह सफाई कर्मचारी भी शामिल हैं।

ग्रामीणों के साथ सैकड़ों जानवर भी फंसे :

केदारनाथ धाम में अब भी आसपास के गांवों के कुछ पशुपालक मौजूद हैं। गांवों तक पहुंचने का रास्ता ध्वस्त होने के कारण करीब 60 भैंसे और सात सौ से ज्यादा बकरियां फंसे पड़े हैं। धाम में पीक सीजन में यात्रियों की चहल-पहल होने के कारण दूध की काफी खपत रही। इस वजह से सीजन में आसपास के गांवों के पशुपालक केदारनाथ धाम का रुख करते हैं। धाम में एक किनारे और अपेक्षाकृत ऊंचे स्थान पर डेरा होने के कारण जानवर बच गए, हालांकि वहां मौजूद पशुपालकों के परिजनों को आपदा ने लील लिया।

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